दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे
वर्ना कहीं तक़दीर तमाशा न बना दे
ऐ देखने वालो मुझे हँस हँस के न देखो
तुम को भी मोहब्बत कहीं मुझ सा न बना दे
मैं ढूँढ रहा हूँ मिरी वो शमां कहाँ है
जो बज़्म की हर चीज़ को परवाना बना दे
आख़िर कोई सूरत भी तो हो ख़ाना-ए-दिल की
काबा नहीं बनता है तो बुत-ख़ाना बना दे
'बहज़ाद' हर इक गाम पे इक सज्दा-ए-मस्ती
हर ज़र्रे को संग-ए-दर-ए-जानाना बना दे।
वो किसी बात का चर्चा नहीं होने देता
वो किसी बात का चर्चा नहीं होने देता
अपने ज़ख्मों का वो जलसा नहीं होने देता
ऐसे कालीन को मैं किस लिए रक्खूँ घर में
वो जो आवाज़ को पैदा नहीं होने देता
यह बड़ा शहर गले सब को लगा लेता है
पर किसी शख़्स को अपना नहीं होने देता
उसकी फ़ितरत में यही बात बुरी है यारो
बहते पानी को वो दरिया नहीं होने देता
यह जो अनबन का है रिश्ता मेरे भाई साहब !
घर के माहौल को अच्छा नहीं होने देता।
मुद्दत के बाद उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह
इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े
हंसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े
जिस तरह हंस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क
यूं दूसरा हंसे तो कलेजा निकल पड़े
इक तुम कि तुम को फ़िक्र-ए-नशेब-ओ-फ़राज़ है
इक हम कि चल पड़े तो बहर-हाल चल पड़े
साक़ी सभी को है ग़म-ए-तिश्ना-लबी मगर
मय है उसी की नाम पे जिस के उबल पड़े
मुद्दत के बाद उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह
जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े।
तुम्हारे मौन पर जब लिख गई कविता मेरी
तुम्हारे मौन पर जब लिख गई कविता मेरी
तभी मैं जान पाया शांत होना है हुनर कोई।
तुम्हारी नजरों से जब झरने लगे आंसू बेहिसाब
तभी जाना मैंने दिल में भी होता है गुबार कोई।
तुम्हारे पास सांसों की गर्मी का अहसास
तभी जाना के मन को ठंड मिलती यहीं।
तुम्हारा पैर से मिट्टी खुरचना, फिर होठों को दबाना
तभी मैं जान पाया गरीबों की मुहब्बत होती है कैसी।
