ये कैसा इश्क़ ए शहर है ,दर बदर की ठोकरें खा रहा हूँ
वो बेवफा है फितरती,फिर भी क्यो उसे हमनवां मान रहा हूँ
हासिल नहीं होना है कुछ भी सिवाय अश्कों की धारों से
अनजाने शहर में गुमनाम जिये जा रहा हूँ
ये कैसा इश्क़ ए शहर है ,,,
आया था कभी मैं तेरे शहर में मोहब्बत कमाने को
अपने दिल को रखकर गिरवी,तेरी रूह में अपना घर बनाने को
धोखे तू देती रही मुझे वक़्त वक़्त पर
खुद के बिखर जाने पर भी एक तुझको ही चाहे जा रहा हूँ
ये कैसा इश्क़ ए शहर है ,दर बदर की ठोकरें खा रहा हूँ ।।
ऐ रब मौत दे दे या दे दे मोहब्बत के आशियाने
मैं आजिज आ चुका हूं गमो की ज़िंदगी से
दे दे मुझे कोई बाहों का सहारा,नही सहे जाते ये दर्दो के फसाने
तड़प रहा हूँ दिल ही दिल मे ,अब खुलकर रोना चाह रहा हूँ
ये कैसा इश्क़ ए शहर है ,दर बदर की ठोकरें खा रहा हूँ ।।
हो सके तो मुझे ज़िंदा ही दफ़न कर दो मेरी कब्र में
कैसे खुद को रख लूं अजियतो के शहर में
गुजर अब मेरा होता नही है हिज्र की रातों में
टूट चुका हूं मैं तन्हा रहकर ,कब तक रहूँ इलाही मैं सब्र में
फलक पर रूह के साथ मैं अब जा रहा हूँ
ये कैसा इश्क़ ए शहर है ,दर बदर की ठोकरें खा रहा हूँ ।।

Beautiful gazal
ReplyDeleteNine lines
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