गजल : रूह की बेचैनी

मरीज ए इश्क़ हो गया हूँ ,रूह को सुकून मिलता नहीं
तलाश करता ही रहता हूँ हकीम का पता
बेरुखियो की दवाओं में करार भी तो मिलता नहीं
खूबसूरत चेहरे की तलब है कहाँ मेरे दिल को
उम्दा सीरत वाले चेहरे भी तो कहीं मिलते नहीं
मरीज़ ए इश्क़ हो गया हूँ,रूह को सुकून मिलता नहीं ।।
ज़िस्म की रंगत बंजर ओ वीरान हो भले ही
वफ़ा की खूबियों वाला किरदार मुझे मिलता भी तो नहीं
निगाहों में हो कशिश ,बेपनाह मोहब्बत की
ऐसा कोई दिलदार मेरी निगाहों को नजर आता नहीं
निकला हूँ नाकाम राँहो में हमनवां को खोजने
कोई मेरा हमसफ़र बनता क्यो नही
मरीज़ ए इश्क़ हो गया हूँ ,रूह को सुकून मिलता नहीं ।।
लिख दूँ खुद की ज़िंदगी को उसके नाम
ऐसी हमनशीं की ख्वाहिश क्यो मुकम्मल मेरी होती नहीं
क्यों उलझा हुआ मैं अपनी उलझनों में
मेरा हिमायती मुझे क्यों कोई समझाता नहीं
भटक रहा हूँ दर बदर जमाने की खाक में
कोई वाजिब चेहरा भी अब नजर आता नहीं
मरीज ए इश्क़ हो चला हूँ, रूह को सुकून मिलता नहीं ।।
 रूह की बेचैनी
 रूह की बेचैनी

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