दिल में जो उबल रहा है कुछ तो है
आग सा कुछ जल रहा है कुछ तो है
साफ़गोई, सच बयानी, तल्ख़ बातों की चुभन
दोस्तों को खल रहा है कुछ तो है
आड़ में ऊंचे उसूलों की किसी अभिशाप सा
क़ौम को जो छल रहा है कुछ तो है
कुछ नहीं तो हर क़दम ये सरसराट सी हैं क्यूं
आस्तीं में पल रहा है कुछ तो है
दिन है या सूरज है या फिर आदमी की आस्था
रफ़्ता-रफ़्ता ढल रहा है कुछ तो है
तुम जुदा, दुनिया खफ़ा है फिर भी इक उम्मीद सा
दिल में मेरे पल रहा है कुछ तो है
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| कुछ तो है |
